Juma Khutba and My Laughing
जुमा खुतबा और मेरी हंसी
वैसे तो मैं संजीदा किस्म का इंसान हूं (गुमान है कि लोग भी ऐसा ही समझते होंगे), लेकिन कभी कभी ऐसी हंसी आती है कि उस पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है।
जुमा खुतबा से करीब 3 या 4 मिनट पहले इमाम साहब पिछले दरवाजे से मस्जिद से बाहर चले गए। मेरे जैसे कई लोग ये सोचे होंगे कि नया वुजू बनाकर आ जाएंगे।
वो गुमान के मुताबिक आ भी गए। लेकिन एक 5 से 6 फीट लंबी और 2 से 3 इंच मोटी लाठी के साथ मुस्कुराते हुए हाजिर हुए।
एक हाथ मे लाठी लेकर खुतबा देना सुन्नत है। लेकिन ये सुन्नत अपनी मस्जिद मे कुछ साल से बंद थी। फिर अचानक जिस परिस्थिती मे या कहें तो निराला अंदाज मे शुरू हुई, देखकर मुझे तो बेकाबू हंसी आ गई।
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