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Sunday, October 8, 2023

Population of All Castes of Muslims in Bihar 2023

Know population of all castes of Muslims in Bihar here. Such as Sheikh, Syed, Mallik, Pathan, Ansari, Darji, Kalal/ Iraqui/ Eraqui etc and all from Bihar. 

Kindly click link to check PDF file.


For check related video, kindl click following link: 

Know population of all castes of Muslims in this video.  Sheikh, Syed, Mallik, Pathan, Ansari, Darji, Kalal/Eraqui/ Iraqui, Dhuniya, Dhobi etc and all of Muslims.   https://youtu.be/FbpunH9GbYE



HashTags and Topics: muslim population in bihar bihar population bihar caste census report shaikh population in bihar ansari population in bihar khan population in bihar syed population syed population in bihar kalal population in bihar iraqui population in bihar eraqui population in bihar caste census latest news hindi news bihar news bihar breaking news bihar caste census news bihar caste survey nitish kumar cm bihar tejaswi yadaw deputy cm bihar caste census Muslim castes population in bihar population of khan / pathan population of syed population of shaikh population of mallik population of ansari/ momin/ julaha population of kalal /eraqui/ iraqui population of darji/idrisi population of kunjda/ rayeen population of dhobi population of shershahbadi population of sai/ fakeer / diwan/ madaar population of surajapuri population of saikalgar/ sikalgar population of chudihara population of halalkhor/ mehtar/ laalbegiya/ bhangi population of intfarosh/ intafarosh/ gadhedi/ itpaj ibrahimi population of kasab / kasai population of chik/ cheek population of jat population of thakurai / turk hazam population of dafali population of dhuniya population of nat population of naalband population of chamariya population of bakkho population of bhatiyara population of bhaat population of madariya population of madaari population of mukeri population of miriyasin population of morshikar population of rangrej muslim kalwar population baniya, sudhi, modak, maayra, roniyar, pansari, modi, karora, kesharwani populaion thathera, hindu kalwar, viyahut kalwar, kamalapuri vaishya, mahuri vaishya population bangi vaishya, bangali baniya, varnwal, agrahari vaishya, vaishya poddar population kasodhan, gandhbanik, batham vaishya, goldaar population

Thursday, June 17, 2021

Ordnance Factory Board i.e. OFB

Ordnance Factory Board i.e. OFB is an Indian Government organisation. Its head quarter is in Kolkata. At present total 41 factories across all over India are under this organisation. Its posses the unique distinction of over 200 years experience in defence production. Its engaged in production, testing, logistics, research, development and marketing of a comprehensive product range in the area of ĺand, sea and air systems.

From yesterday i.e. 16.06.2021, it is in news and a matter of discussion due to new announcement of India Government.

Yesterday, Indian Government has announced to dissolve Ordnance Factory Board i.e. OFB and to replace by 7 new Defence Public Sector Undertakings, which will oversee the 41 ordnance factories across all over India.

The cabinet of India Government, yesterday, approved the creation of the entities, which will be 100 percent owned by the government. 

Tuesday, October 13, 2020

बिहार का अगला मुख्यमंत्री या तो तेजस्वी होंगे या उपेन्द्र कुशवाहा या भाजपा से कोई भी Next CM of Bihar will be Tejaswai or Upendra or anyone from BJP

 बिहार का अगला मुख्यमंत्री या तो तेजस्वी होंगे या उपेन्द्र कुशवाहा या भाजपा से कोई भी Next CM of Bihar will be Tejaswi or Upendra or anyone from BJP

मेरी राय मे बिहार अगला मुख्यमंत्री या तो तेजस्वी होंगे या उपेन्द्र कुशवाहा या भाजपा से कोई भी। नीतीश को चिराग इतना कमजोर करेंगे कि वे अब CM पोस्ट क्लेम ही नही कर पाएँगे।

AIMIM के समर्थन से उपेन्द्र कुशवाहा पहले से मजबूत होंगे।  मुस्लिम, दलित, कोईरी जाति समेत कई पिछडी जाति का अच्छा खासा वोट इस गठबंधन को मिलने की उम्मीद कर सकते हैं।

भाजपा प्रेमी जदयू को कमजोर और लोकजन शक्ति पार्टी को मजबूत कर सकते हैं ताकि CM पोस्ट क्लेम कर सकें।

Sunday, October 11, 2020

रामविलास पासवान कर्मठ इंसान भी कहलाए, और राजनीति के मौसम वैज्ञानिक भी, आखिर क्यों? Ram Vilas Paswan

रामविलास पासवान कर्मठ इंसान भी कहलाए,

और राजनीति के मौसम वैज्ञानिक भी,

आखिर क्यों?  जानिए इस वीडियो मे। 

https://youtu.be/LDdSTjeDG88 

#रामविलासपासवान,

#RamVilasPaswan, #ChiragPaswan, #BiharElection2020,



Thursday, August 6, 2020

कांग्रेस अगर भाजपा मे विलय कर ले तो.....

 कांग्रेस अगर भाजपा मे विलय कर ले तो देशवासियों को कम से कम दो फायदे होंगे:

1. कांग्रेस के नाम पर वोट देने वाले गुमराह होने से बच जाएँगे।

2. भाजपा को जो मेहनत राज्य की कांग्रेस सरकार को गिराने मे करनी पड़ती है वह मेहनत कहीं और काम मे आ सकती है। 

Monday, April 29, 2019

कन्हैया कुमार के गुण (Merits of Kanhaiya Kumar)

A. बिहार मे सामाजिक न्याय के मसीहा:

1- कर्पूरी ठाकुर
2- लालू यादव
3- कन्हैया कुमार

B. तेजस्वी आज जो कुछ भी हैं, लालू की वजह से, जबकि कन्हैया अपनी मेरिट की वजह से।

C. लालू के बाद बिहार का लालू कन्हैया बनेगा, तेजस्वी नहीं।

D. कन्हैया की ईमानदारी देखिए कि चुनाव प्रचार के लिए वैध तरीके से प्राप्त चंदे रू 70 लाख को चुनाव प्रचार पर ही खर्च कर रहा है।

E. कुछ लोग कन्हैया से जलन कर  सकते हैं पर उसे रोक नहीं सकते. अपने मेरिट से  वो बड़ा नेता बन चुके हैं.  

F. अफवाह और गलतफहमी को दरकिनार कर बेगुसराय से कन्हैया का समर्थन करें।

G. क्या बिहार के अगला मुख्यमंत्री  कन्हैया हो सकते हैं  BMC(भूमिहार-मुस्लिम-कम्युनिस्ट) समीकरण से? तेजस्वी जम नहीं रहे आजकल।

H. जो इंसाफ की बात करेगा। हमारा साथ उसे रहेगा। वह चाहे यादव (लालू) हों या हों भूमिहार (कन्हैया)।

I. मुसलमान धर्म के आधार पर वोट नहीं करता। अगर करता तो सैयद शाहनवाज हुसैन और मुख्तार नकवी को भी वोट करता। बेगुसराय मे तनवीर हसन के होते हुए भी ज्यादातर मुसलमान कन्हैया को वोट करेंगे क्योंकि कन्हैया तनवीर के मुकाबले साम्प्रदायिकता के खिलाफ ज्यादा सशक्त और मुखर हैं।

J. जिनके लिए  कन्हैया का स्वर्ण होना पाप है, क्या वे ऐसा इरादा कर सकते हैं कि किसी भी पार्टी के किसी भी स्वर्ण को वोट नहीं करेंगे। मेरी राय तो यह है कि उम्मीदवार चाहे किसी भी धर्म या किसी भी जाति से हो, अगर वह न्यायप्रिय पार्टी से हो, आपका और देश का हित चाहता हो, तो उसका समर्थन कीजिए।

K. कन्हैया कुमार तेजस्वी से ज्यादा काबिल हैं। लालू के सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए कन्हैया को ही आगे करना चाहिए।

L. @kanhaiyakumar को अगला मुख्यमंत्री  बनाने के लिए, CPI को अगला बिहार विधान सभा चुनाव  की तैयारी शुरू कर देना चाहिए।

Friday, March 29, 2019

बेगुसराय से कन्हैया को जीतना चाहिए (Kanhaiya should win from Begusaray)

          राष्ट्रीय जनता दल द्वारा कन्हैया कुमार को बेगुसराय लोकसभा सीट से समर्थन न देना निंदनीय है। भविष्य मे इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है जो कि साम्प्रदायिकता, गरीबी, कुपोषण से लड़ने का दावा करती है।


       जिनके लिए  कन्हैया का स्वर्ण होना पाप है, क्या वे ऐसा इरादा कर सकते हैं कि किसी भी पार्टी के किसी भी स्वर्ण को वोट नहीं करेंगे। मेरी राय तो यह है कि उम्मीदवार चाहे किसी भी धर्म या किसी भी जाति से हो, अगर वह न्यायप्रिय पार्टी से हो, आपका और देश का हित चाहता हो, तो उसका समर्थन कीजिए।


    उम्मीद है कि राजद के तनवीर हसन कन्हैया के समर्थन मे अपनी उम्मीदवारी जल्द ही वापस लेंगे।

Sunday, September 30, 2018

जजों के मनमाफिक फैसले (Judgement from Judge's Opinion)

            यह तो सब कोई जानता है कि भारत मे कानून बनाने और कानून खत्म करने का अधिकार भारतीय संसद को है। जजों का काम बने हुए कानून के आधार पर फैसला सुनाना है। लेकिन यह आजकल उल्टा हो गया है। जज अपनी विचारधारा और अपनी पसंद से फैसले सुना रहे हैं और एक ही झटके मे अपने  आदेश  से पुराने कानून को खत्म कर रहे हैं। 

            समलैंगिकता और व्यभिचार से संबंधित कानून को खत्म करना इसका ताजा उदाहरण है। मुस्लिम पर्सनल लाॅ होते हुए भी जजों के कई फैसले भी इसके खिलाफ पाए गए हैं।PO

               मेरा मानना है कि जजों को अपने फैसले बने हुए कानून के आधार पर देना चाहिए न कि अपनी पसंद और अपनी विचारधारा के आधार पर। किसी कानून को खत्म करने और नया कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ देना चाहिए।

Tuesday, August 7, 2018

दफनाना ब्राह्मणवाद का विरोध दर्शाना है

         तमिलनाडु के बड़े नेताओं  अन्नादुरैई, एम जी रामचंद्रन के बाद जयललिता को भी दफनाया गया क्योंकि वह एक द्रविड़ पार्टी की प्रमुख थीं, जिसकी नींव ब्राह्मणवाद के विरोध के लिए पड़ी थी.  चूँकि करुणानिधि भी इस आंदोलन से जुड़े रहे हैं इसलिए उन्हें भी दफ़नाया जाएगा. इनका दफनाना ब्राह्मणवाद का विरोध दर्शाना है। 
साभार : बीबीसी हिंदी

Sunday, February 5, 2017

उत्तर प्रदेश चुनाव मे AIMIM, पीस पार्टी, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल को वोट कीजिए (Vote for AIMIM, Peace Party and RUC in Uttar Pradesh)

उत्तर प्रदेश चुनाव मे AIMIM, पीस पार्टी, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल को  वोट कीजिए
Vote for AIMIM, Peace Party and RUC in Uttar Pradesh

उत्तर प्रदेश चुनाव मे AIMIM, पीस पार्टी, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल को थोक मे वोट कीजिए अगर यह मुकाबले मे है। आप के थोक वोट इन्हें   जीताने और मुकाबले में लाने की  ताकत रखते हैं. अगर एक बार आपके थोक वोट इन्हें मिल गए तो राजनीती करवट लेगी. फिर कोई आपको ठगेगा नहीं. सिर्फ वोट बैंक नहीं समझेगा बल्कि आपको आपका हक भी दिया जायेगा. 

जहाँ पर इन पार्टियों  के उम्मीदवार नहीं हैं, वहां  कांग्रेस को वोट कीजिए। अंतिम वरीयता पर किसी भले निर्दलीय उम्मीदवार या बसपा को रखें. 



भाजपा की फिक्र नहीं कीजिए। भाजपा को रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ मुसलमानों की नहीं है। भाजपा की नोटबंदी नीति से मरने वाले और परेशान होने वाले सिर्फ मुसलमान तो नहीं थे।

अगर सपा चुनाव जीती तो 'मुसलमानों को भाजपा का डर' दिखाने की नीति जारी रखेगी। इसलिए भाजपा से ज्यादा सपा को हराने की जरूरत है। 


उत्तर प्रदेश के मुसलमान किस पार्टी को वोट देंगे, पढ़िए मेरा पूरा ब्लाॅग इस लिन्क पर।


#नोटबंदी
 #अखिलेश 
#मायावती 
#राहुल गाँधी 
#उत्तरप्रदेश 
#चुनाव
#असदुद्दीन 
#मजलिस 
#अकबरुद्दीन 
#ओवैसी 

Friday, January 27, 2017

उत्तर प्रदेश चुनाव: मुसलमान असमंजस मे (Uttar Pradesh Elections: Muslims Are Confused To Vote)

उत्तर प्रदेश चुनाव: मुसलमान असमंजस मे 
(Uttar Pradesh Elections: Muslims Are Confused To Vote)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१७ रोमांचक स्थिति में है. श्री अखिलेश यादव ने अपने पिता  श्री मुलायम सिंह यादव और चाचा श्री शिवपाल सिंह यादव को हराकर पहली बाधा पार कर ली. कांग्रेस से गठबंधन कर के श्री अखिलेश ने दूसरी बाधा भी पार कर ली है. कांग्रेस से गठबंधन के पहले स्थिति साफ़ नहीं थी कि मुकाबला किसके बीच में है. अब यह बात साफ़ हो गई है कि मुकाबला त्रिकोणीय होगा, बाज़ी कौन मारेगा , वोटों की  गिनती के बाद ही पता चलेगा. नोटबंदी की  मार झेल रही जनता भाजपा को तीसरे स्थान पर भेज सकती है. सुश्री मायावती की  बसपा पहले नंबर पर आती है या सपा-कांग्रेस गठबंधन, कुछ कहा नहीं जा सकता. श्री असदुद्दीन ओवैसी की  पार्टी “ऐमिम’’(AIMIM) कुछ सीटें प्राप्त कर उत्तर प्रदेश मे अपनी  उपस्थिति पांचवीं पार्टी के रूप में दर्ज करा सकती है.


   मेरे विचार में  कांग्रेस ने सपा से गठबंधन करके गलती की है. कांग्रेस और राहुल गाँधी ने जिस ढंग से  उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान की  शुरुआत की  थी, जनता में अच्छा सन्देश गया था. इस गठबंधन से वह सन्देश जाता रहा है. अगर गठबंधन भी करना था तो बसपा से करना चाहिए था क्योंकि सपा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Ante Incumbency Factor) भी काम कर सकती है. बसपा और कांग्रेस के साथ अगर ‘ऐमिम’ भी आ जाती तो इस गठबंधन को हराना दूसरों के लिए काफी मुश्किल था क्योंकि  आजकल उत्तर प्रदेश के अधिकांश मुसलमानों का झुकाव इस पार्टी की  तरफ हुआ है.

बसपा और ऐमिम की  संभावित गठबंधन की अफवाह कई बार उड़ चुकी है पर ऐसा न हो सका. सूत्र बताते हैं कि इसके लिए मायावती ही जिम्मेदार है. उन्हें लगता है कि अगर एक बार इनसे गठबंधन हो गया तो श्री ओवैसी मुसलमानों के निर्विवाद नेता हो जायेंगे जिस तरह वह खुद दलितों की  है और भविष्य में हमेशा मुसलमानों के वोट के लिए ओवैसी पर आश्रित रहना पड़ेगा. लेकिन इस बार अगर मुसलमानों के अधिकांश वोट ऐमिम को चला गया तो मायावती के सामने ५ साल के लिए पश्चाताप करने के सिवा कुछ न मिलेगा. मायावती पूर्व मे भाजपा से मिलकर सरकार  बना चुकी हैं और भविष्य मे वह ऐसा नहीं करेगी, इसका वादा वह नहीं करतीं. हालाँकि मायावती ने इस बार टिकट  बाँटने में मुसलमानों को तरजीह दिया है फिर भी वह मुसलमानों के लिए संदिग्ध हैं. वैसे मायावती के शासन में जो उत्तर प्रदेश की  कानून व्यवस्था थी वह अखिलेश शासन से तो बेहतर ही कही जा सकती है.

आज से पहले, उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोट कांग्रेस, सपा और बसपा में बंटती रही है. कांग्रेस और ऐमिम का गठबंधन पूर्व में आंध्र प्रदेश में रहा है है पर आज यह मुश्किल इसलिए दिखता है कि दोनों एक दुसरे पर ‘बयानों’ के हमले कर रहे हैं ताकि मुसलमानों के वोट उनको मिले.

मुज़फ्फरनगर आदि दंगों और कानून व्यवस्था को लेकर सपा से उत्तर प्रदेश के मुसलमान काफी नाराज हैं. मुसलमानों के लिए आरक्षण का वादा भी अखिलेश ने पूरा नहीं किया. इस बार तो आरक्षण का वादा भी नहीं किये. ऐसा लगता है कि सपा भी अब भाजपा कि नीतियों का अनुसरण कर रही है.

उत्तर प्रदेश  के मुसलमानों का  एक धड़ा  ‘ऐमिम’ से इस बात पर नाराज है कि उसने उत्तर प्रदेश में पूर्व से मुस्लिम हितों के लिए काम कर रही  पार्टी पीस पार्टी, राष्ट्रीय  उलेमा कौंसिल और कौमी एकता दल की अनदेखी की है और आपसी गठबंधन के लिए कोई प्रयास नहीं किया.


कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश का मुसलमान असमंजस की  स्थिति में है कि वोट किसे दें और किसे न दें.

Wednesday, October 5, 2016

शहाबुद्दीन मुस्लिमों के रहनुमा नहीं बन सकते (Shahabuddin can't be leader of Muslims)

राजद के पूर्व सांसद और दबंग नेता मो० शहाबुद्दीन आजकल चर्चा के केंद्र में हैं. हर कोई उनकी चर्चा कर रहा है चाहे उनके विरोधी हों या फिर समर्थक. कुछ दिन पहले तक शायद उनको भी यह अहसास नहीं होगा कि उनकी चर्चा सिर्फ देश में नहीं बल्कि विदेशों में भी होगी. उनकी सनसनी अगर पूरी दुनिया में है तो इसका क्रेडिट भारतीय मीडिया और भारतीय जनता पार्टी को जाता है.

शायद इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी जैसी बड़ी पार्टी ने हाई कोर्ट के बेल के फैसले को ‘राज्य सरकार’ का फैसला बता कर पुरे राज्य में आन्दोलन किया. देश की  कई निचली अदालतों ने दंगा, फेक एनकाउंटर, दलित नरसंहार, हत्या आदि कई बड़े अभियुक्तों को बेल दिया है या बरी किया है पर उसके खिलाफ इस ढंग का आन्दोलन नहीं देखा गया और न ही मीडिया में ज्यादा सुर्खियाँ पाई.
मीडिया और कुछ राजनितिक पार्टियों द्वारा किये इस अन्याय की  वजह से मो० शहाबुद्दीन के प्रति कुछ लोगों में सहानुभूति पैदा हुयी है. इस सहानुभूति को सोशल मीडिया और शहाबुद्दीन के समर्थकों द्वारा चलाये गए आन्दोलन में भारी भीड़ से समझा जा सकता है.
इस सहानुभूति और समर्थन से मो० शहाबुद्दीन के समर्थक उन्हें मुस्लिमों के रहनुमा के तौर पर पेश कर रहे हैं पर मुझे लगता है कि ऐसा नहीं हो सकता. मो० शहाबुद्दीन मुस्लिमों के रहनुमा नहीं बन सकते जैसी सोंच में  मुझे निम्नलिखित कारण दिखलाई पड़ते हैं.
१.      आजादी के बाद से ही मुस्लिम गैर-मुस्लिम को ही अपना नेता बनाते आये हैं. पहले गैर-मुस्लिम नेतृत्व वाली  कांग्रेस फिर सपा, राजद, बसपा आदि पार्टी को वोट देते हैं.
२.      मो० शहाबुद्दीन जिस पार्टी से आते हैं उसका नेतृत्व लालू यादव करते हैं जो कि मुस्लिमों में खूब लोकप्रिय हैं. लालू जैसा नेतृत्व कौशल उनके बस की बात नहीं.
३.      मो० शहाबुद्दीन की  पहचान अब एक अपराधी के रूप में हो चुकी है. इस पहचान से मुक्ति पाना आसान नहीं है. मुस्लिम किसी अपराधी या दागी चरित्र को अपने रहनुमा के तौर पर  स्वीकार नहीं कर सकते.
४.      अगर मुस्लिम को मुस्लिम नेतृत्व चुनना पड़ेगा तो असदुद्दीन ओवैसी उनसे बेहतर विकल्प हैं.
५.      रहनुमा  के तौर पर असदुद्दीन ओवैसी मो० शहाबुद्दीन पर भारी पड़ेंगे क्योंकि उनका जनाधार पुरे देश में है जबकि मो० शहाबुद्दीन का बिहार तक सीमित है.
६.      असदुद्दीन ओवैसी मो० शहाबुद्दीन पर भारी इसलिए भी हैं कि उनकी छवी साफ़ सुथरी है.
७.      असदुद्दीन ओवैसी मो० शहाबुद्दीन पर भारी इसलिए भी  हैं क्योंकि वो दलितों को साथ लेकर चलते हैं जबकि मो० शहाबुद्दीन की  सिवान में लड़ाई दलितों कि हितैषी वामपंथियों से रही है.
८.      असदुद्दीन ओवैसी मो० शहाबुद्दीन पर भारी इसलिए भी पड़ेंगे क्योंकि उनमे भाषण देने की  कला और वाक्पटुता में महारत हासिल है.
९.      मो० शहाबुद्दीन के जेल से जल्द बाहर निकलने के आसार कम हैं.
१०.  मो० शहाबुद्दीन में दबंगई के गुण तो है पर वे राजनीति के वो कुशल खिलाडी नहीं हैं जिसकी वजह से जेल से बाहर आते ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पंगा ले लिए.

लेकिन मुझे यह भी लगता है कि अगर मो० शहाबुद्दीन और असदुद्दीन ओवैसी साथ आते हैं तो कांग्रेस, सपा, राजद, बसपा आदि पार्टी का काफी नुक्सान होगा.

Monday, October 3, 2016

शराब निर्माण और पैकिंग एवं बॉटलिंग भी बंद हो (Production, bottling and packing of liquor should be banned also in Bihar)

       एक तरफ बिहार सरकार बिहार में शराबबंदी को सफलता से लागू करने में जी जान से जुटी हुयी है तो दूसरी तरफ  बिहार में शराब निर्माण (दुसरे राज्यों में आपूर्ति के लिए) और इसके पैकिंग एवं बॉटलिंग को बढ़ावा दे रही है. सरकार का यह दूसरा कदम हास्यास्पद और घोर निराशाजनक है. 


      सरकार फिर किस मुंह से दुसरे राज्यों में भी शराबबंदी की मांग कर रही है? बिहार सरकार से अपील है कि बिहार में शराब निर्माण भी पूर्ण रूप से बंद होना चाहिए. 

        शराब से जुड़े उद्योगों को दुसरे व्यवसाय में बदलने कि सरकार सार्थक पहल करे चाहे इसके लिए इसके व्यवसायियों को मुआवजा ही क्यों न देना पड़े.
- मोहम्मद खुर्शीद आलम
   

Wednesday, August 24, 2016

बिहार में शराबबंदी पर नीतीश को फ़ायदे भी चुनौतियां भी (Benefits and challenges for Nitish Kumar on liquor ban in Bihar)

बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू करके बहुत बड़ा पुण्य का कार्य किया है. इससे पूरे बिहार में शांति का माहौल बना है. वैसे तो हर बिहारवासी इससे लाभान्वित हुआ है पर महिलाएँ और दलित-पिछड़े ज़्यादा लाभान्वित हुए हैं क्योंकि इस दुर्व्यसन के ज़्यादा शिकार और पीड़ित यही थे.

लेकिन बिहार की विपक्षी पार्टियों के कई लोग (सहयोगी पार्टियों के भी कुछ लोग) शराबबंदी क़ानून हटाने के लिए नए-नए हथकंडे अपना रहे हैं और ‪बिहार‬ के मुख्यमंत्री को बदनाम कर रहे हैं तो इसके पीछे कई कारण हैं जिनमे प्रमुख निम्नांकित हैं:
१. शराबबंदी से श्री नीतीश कुमार की छवि काफ़ी चमकी है और पूरे भारत में इनकी वाहवाही हो रही है जो विपक्षी पार्टियों को हजम नहीं हो रहा है.
२. गुजरात में पहले से शराबबंदी है पर इसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी नहीं ले सकती क्योंकि यह कॉंग्रेस के जमाने से है. प्रधानमंत्री के ‘गुजरात मॉडल’ में भी यह शामिल नहीं है. अगर इसे इसमें शामिल करते तो भाजपा शासित अन्य प्रदेशों में भी इसे लागू करना पड़ता जो कि मुश्किल कार्य है.
३. शराब व्यवसाय में ज़्यादा भागीदारी पूंजीपतियों की है जिसका अधिकांश समर्थन भाजपा को है.
४.  श्री नीतीश कुमार की इस अच्छी छवि से सहयोगी पार्टियों में भी बेचैनी है क्योंकि इसका क्रेडिट सिर्फ़ नीतीश कुमार को मिल रहा है क्योंकि उन्हीं का यह चुनावी वायदा था जिसे सरकार बनने के बाद पूरा किया.
५. हर पार्टी में कुछ नियमित शराब पीने वाले हैं, उनको इस शराबबंदी से तकलीफ़ है. वे चाहते हैं कि श्री नीतीश कुमार यह फ़ैसला वापस ले लें.
शराबबंदी की मुश्किलें
१. जो लोग शराब के आदि थे वे इसे कैसे भी हासिल करना चाहते हैं.
२. पड़ोसी राज्यों मे शराबबंदी नहीं है.
३. बुरे तत्व अधिक आय की लालच में या तो इसे पड़ोसी राज्यों से लाकर लुके-छिपे बेच रहे हैं या अवैध ढंग से बिहार में ही निर्माण कर रहे हैं.
४. पुलिसकर्मियों पर काम का दबाव बढ़ गया है.
५. विपक्षी राजनीति की वजह से सब लोग सरकार का साथ नहीं दे रहे हैं.
होना क्या चाहिए
श्री नीतीश कुमार का यह फ़ैसला जनहित में है. सभी देशवासियों को उन्हें इस मसले पर समर्थन देना चाहिए और पूरे भारत में शराबबंदी लागू करने के लिए आंदोलन करना चाहिए. शराबियों को आदत से छुटकारा पाने में वक़्त लगेगा और अच्छे परिणाम आने में भी. शराबियों की हाय-तौबा पर ध्यान न देकर श्री नीतीश कुमार अपने फ़ैसले पर अडिग रहें और शराब पीने से होने वाले नुक़सान का ज़ोर-शोर से प्रचार करते रहें.

Sunday, April 17, 2016

समाजवादी पार्टी से मुस्लिमों का मोहभंग (Muslims are annoyed from Samajwadi Party)

उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव मे पिछड़ी जाति ख़ासकर यादव और मुस्लिमों के सपा की ओर ध्रुवीकरण से सपा को अप्रत्याशित जीत मिली थी पर इस समय यह समीकरण बिखराव पर है. सत्ता मे आने के बाद से समाजवादी पार्टी राज्य मे दंगों को रोकने मे नाकाम रही जिससे मुस्लिमों का मोहभंग होना शुरू हो गया. मुसलमानों के लिए किए अधिकांश वादे खोखले साबित हुए. इस मोहभंग को भुनाने मे ओवैसी की पार्टी सबसे ज़्यादा कामयाब हुई है. लेकिन सत्ता तो इनके बूते नही इसलिए फिर से मायावती को नेता चुनने के लिए तैयार हैं.


समाजवादी पार्टी से मुस्लिमों के मोहभंग ने जहाँ सुश्री मायावती को फिर से सत्ता मे आने की उम्मीद जगा दी है वहीं एआईएमआईएम प्रमुख श्री असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश मे जनाधार बढ़ने का ख्वाब देख रहे हैं. समाजवादी पार्टी क़ानून व्यवस्था के नाम पर श्री ओवैसी की जनसभाओं पर बार बार प्रतिबंध लगाकर उत्तर प्रदेश मे उनके असर को कम करना चाहती है लेकिन अक्सर देखा गया है कि प्रतिबंधों का उल्टा ही असर होता है. ऐसे बार बार के प्रतिबंधों से लोगों की सहानुभूति भी मिल सकती है. सहानुभूति इस लिए भी हो सकती है क्योंकि भाजपा के कुछ विवादित नेता सभाओं मे कुछ भी बोल देते हैं पर उन पर किसी तरह की पाबंदी नही लगाई गई.


श्री ओवैसी ने महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा और नगर निगम चुनाव से एक और चाल भी चल दी है. उन्होने वहाँ अपनी पार्टी से दलितों को भी टिकट दिया और मुसलमान और दलित दोनों से वोटों की अपील की. इस तरह वह अपनी पार्टी की सिर्फ़ मुस्लिम पहचान को धोना चाहते हैं. इसमे उन्हे कितनी कामयाबी मिली, साफ तौर पर कहा नही जा सकता. लेकिन उनके भाषणों की भाषा बदल गयी है, यह तो कहा ही जा सकता है.


२०१७ तक उत्तर प्रदेश की राजनीति किस करवट लेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन अगर मायावती और ओवैसी का गठबंधन हुआ तो मुकाबला रोचक ज़रूर होगा.

समाजवादी पार्टी परंपरागत मुस्लिम वोट को खिसकने से रोकने की भरपूर कोशिश करेगी लेकिन नतीजों के बाद सत्ता मे बने रहने के लिए भारतीय जनता पार्टी से हाथ भी मिला सकती है. भारतीय जनता पार्टी की नज़र धर्मनिरपेक्ष वोटों के बिखराव पर टिकी होगी क्योंकि राहुल गाँधी की सक्रियता की वजह से दलित, पिछड़ी जाति और मुस्लिम के कुछ वोट कॉंग्रेस पार्टी को भी जाने की उम्मीद है.


अगर संभावित गठबंधन मे कॉंग्रेस भी शामिल हुई तो इनका पलड़ा भारी होने की उम्मीद है. पर समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के आपस मे सॉफ्ट कॉर्नर को देखते हुए यह कहना बहुत मुश्किल है कि आख़िर मे सत्ता किसके हाथ लगेगी.




Thursday, March 26, 2015

क्या SP और BJP के बीच सांठ-गांठ है? (Is any hidden alliance between SP and BJP?)

समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच सांठ-गांठ के आरोप कई बार पढ़ चुका हूँ लेकिन मुझे यकीन कभी नहीं हुआ और अधिकांश लोग भी यकीन नहीं करते होंगे। कारण साफ है कि खुले में दोनों पार्टियां एक दूसरे की घोर विरोधी हैं। जहां भारतीय जनता पार्टी के नेता और समर्थक बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपी बने, वहीं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिये तथाकथित 'रामभक्तों' पर गोलियां चलवाईं। जहां भारतीय जनता पार्टी मुसलमानों को दिये 5% आरक्षण भी छीन लेती है, वहीं समाजवादी पार्टी मुसलमानों को 18% आरक्षण देने की बात करती है (यह अलग बात है कि देती 1% भी नही है)।

 
भारतीय जनता पार्टी जहां पूंजीपतियों और स्वर्ण लोगों की पक्षधर मानी जाती है, वहीं समाजवादी पार्टी गरीबों और पिछड़ी जाति की समर्थक मानी जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि दोनों को सिद्धांततः घोर विरोधी माना जाता है।
 
हालांकि आजकल की परिस्थितियों के मद्देनज़र इनके घोर विरोधी होने में मुझे भी शक होने लगा है और ऐसा प्रतीत होने लगा है कि अंदर ही अंदर इनके बीच सांठ-गांठ है। कुछ उदाहरण देखिए:
 
1. मुजफ्फरनगर दंगों पर कई दिनों तक काबू नहीं पाया गया। इतने बड़े प्रदेश की पुलिस के पास इतने संसाधन तो जरूर हैं कि किसी एक शहर मे दंगा होने पर तुरंत काबू पा सकें लेकिन या तो इच्छाशक्ति की कमी रही या राजनीतिक साजिश यानी नुकसान होने के बाद मुआवजा देकर मसीहा बनने का ढोंग।
 
2. उत्तर प्रदेश के कई शहरों में कुछ साम्प्रदायिक नेता खुलेआम भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहे हैं। ये भाषण मीडिया की सुर्खियां बन रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी सभाओं में पुलिस अधिकारी भी मौजूद रहते होंगे पर कार्रवाई किसी पर नहीं हो रही।
 
3. बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय मुख्यमंत्री रहे श्री कल्याण सिंह से पूर्व में समझौता कर अपनी खुली नीतियों मे संदेह तो समाजवादी पार्टी ने पहले ही पैदा कर दिया था।
 
4. हाल में मुलायम सिंह यादव ने अपने पोते की शादी मे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को बुलाकर इनसे घालमेल की संभावना को मजबूती दी है।
 
5. हिंदूवादी संगठनों के दबाव में आकर ऑल इंडिया मसलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को 29 मार्च को आगरा में बैठक करने की इजाजत नहीं दी गई। नवभारत टाइम्स का यह समाचार भी देखें :
 
6. धर्म परिवर्तन और घर वापसी के नाम पर सबसे ज्यादा अफरा-तफरी का माहौल उत्तर प्रदेश में ही रहा।
 
 
नोट : लेखक के सभी ब्लॉग पोस्ट पढ़ने के लिए लिंक http://mka-mka.blogspot.com/ पर जाएं।

Wednesday, March 4, 2015

आप, हम और तुम (AAP, HAM And TUM)

दिल्ली विधानसभा चुनाव में 'आप' की अप्रत्याशित सफलता से प्रेरित होकर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री जीतन राम माँझी और उनके समर्थकों ने 'हम' (हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा) नाम की पार्टी बना ली। श्री माँझी और उनके समर्थकों को पूरी उम्मीद होगी कि ऐसा नाम रखने से उन्हें बिहार में भी वही सफलता मिलेगी जो सफलता दिल्ली में 'आप' को मिली है। अगर उनकी उम्मीद सही साबित हुई तो फिर ऐसे पार्टी नामों की झड़ी लग जायेगी जिनके संक्षेप 'तुम', 'वह', 'लोग' आदि शब्द बनते हों।

 

'आप' कहीं 'तुम' न बन जाये?

कुछ दिनों से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव की जो खबरें आ रही है, उससे लगता है कि 'आप' मे कुछ गडबड है। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल ने अपने कार्यकर्ताओं को अप्रत्याशित जीत से उत्साहित होकर घमंड न करने की सलाह दी थी लेकिन लगता है कि सबसे ज्यादा घमंड उन्हीं में आ गया है। अगर श्री केजरीवाल के समर्थक प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को हाशिये पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं तो उनका मौन समर्थन जरूर होगा। अगर श्री केजरीवाल यह समझते हैं कि दिल्ली की जनता ने सिर्फ उनके नाम पर वोट दिया है तो उनकी यह भूल होगी। दिल्ली की जनता ने 'आप' को वोट दिया है और श्री केजरीवाल को नेता माना है।

 
'आप' की जीत में पार्टी के सभी नेताओं के साथ ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका है। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव ने भी जीत में भूमिका निभाई है। श्री केजरीवाल के भाषणों से लगता है कि उन्हें सर्वशक्तिमान ईश्वर में गहरी आस्था है, इसलिये उन्हें चाहिये की बड़ी जीत के बाद भी ईमानदार रहें और किसी अन्य नेता के खिलाफ साजिश न करें। बड़ी जीत के कारण यह संभव है कि इन दो नेताओं को पार्टी से निकालने के बाद भी दिल्ली सरकार पर कोई असर न पड़े पर उन्हें यह ध्यान में रखना होगा ईश्वर छोटे बड़े सभी पापों पर नज़र रखता है और कभी भी सजा दे सकता है। ईश्वर की एक सजा यह भी हो सकती है कि 'आप' की इज़्ज़त 'तुम' जैसा कर दे।
 
विश्वसनीय साथी
जिस ढंग से श्री नरेन्द्र मोदी को बहुत पहले ही भरोसेमंद और विश्वसनीय साथी के रूप मे अमित शाह मिले थे उसी ढंग से श्री अरविन्द केजरीवाल को श्री मनीष सिसोदिया मिले हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अमित शाह को विश्वसनीयता के उपहार में भाजपा का पार्टी अध्यक्ष बनाया, उसी तरह मुख्यमंत्री केजरीवाल ने सिसोदिया को उप-मुख्यमंत्री बनाया। बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार विश्वसनीय साथी की तलाश में गच्चा खा गये और श्री जीतन राम माँझी बेवफा निकल गये।

Tuesday, February 17, 2015

प्री-पोल सर्वे पर रोक लगाएं (Pre poll survey should be banned)

सेवा में,
श्रीमान मुख्य चुनाव आयक्त,
चुनाव आयोग, नई दिल्ली, भारत
 
विषय : प्री-पोल सर्वे पर रोक लगाएं
 
महाशय,
 

  आजकल मीडिया समूह द्वारा एग्ज़िट पोल मतदान होने के बाद दिया जाता है। मेरी जानकारी मे यह पूर्व में मतदान के पहले ही प्रकाशित और प्रसारित किया जाता था। जब चुनाव आयोग ने इस पर प्रतिबंध लगाया तो मतदान के बाद प्रकाशित-प्रसारित किया जाने लगा। यह उचित भी है, इसलिये मैं एग्ज़िट पोल के इस रूप पर कोई शिकायत नहीं कर रहा।

 
मेरी शिकायत प्री-पोल सर्वे को लेकर है। यह पूर्व के एग्ज़िट पोल जैसा ही है जिस पर आपने प्रतिबंध लगाया था। मुझे लगता है कि यह प्री-पोल जनता की सोच को प्रभावित करता है। पिछले लोकसभा चुनाव और हाल के दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो आपको मेरी शिकायत मे सच्चाई का आभास होगा।
 

पिछले लोकसभा चुनाव में प्री-पोल सर्वे भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थे। फिर नतीजे इसी पार्टी के पक्ष में आये और वोट प्रतिशत तथा सीटें अनुमान से ज्यादा बढ गईं। यही हाल दिल्ली के विधानसभा चुनाव में हुआ और प्री-पोल सर्वे का लाभ यहाँ आम आदमी पार्टी को मिला।

 
इसलिये आपसे गुजारिश है कि चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद के हर तरह के प्री-पोल सर्वे पर प्रतिबंध जल्द से जल्द लगाएं।

To,

The Chief Election Commissioner,

Election Commission, New Delhi, India



Subject: Pre-Poll Survey should be banned


Sir,



  Now a days, Media Group publishes and broadcasts the Exit Poll after poll. In my knowledge, before few years, it was published and broadcasted before the poll. The EC banned the exit poll to  publish and broadcast before the poll then it started to publish and broadcast after the vote. It is appropriate, therefore I do not have any complaints on this form of exit polls.



My complaint is about the pre-poll survey. The former is similar to the exit polls which you banned. I think it affects people's mind before polling. The results of the Loksabha elections and to look at the recent assembly elections in Delhi, you will have realized the truth in my complaint.



The last pre-poll survey  were in favor of BJP. The results came back and vote in favor of the party and the seats were growing faster than anticipated. That happened in the recent assembly elections in Delhi also and AAM AADMI PARTY got benefited from pre-poll survey.



So you are kindly requested to ban on every kind of pre-poll survey after your notification of elections.

Sunday, January 11, 2015

आरक्षण खत्म करने का समय (Reservations should be end)

हाल ही मे BJP नेत्री और केंद्रीय अल्पसंख्यक विकास मंत्री नजमा हेपतुल्ला का बयान पढ़ा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज को किसी आरक्षण की जरूरत नहीं है। उसे इस काबिल बनाया जाए, जिससे कि उसे किसी तरह के आरक्षण की जरूरत ही नहीं हो। बयान तो स्वागत योग्य है लेकिन इतनी बढ़िया सोच सिर्फ मुसलमानों के लिए ही क्यों? यही सोच अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछ़डे वर्गों के लिए क्यों नहीं? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि इन्हें भी आरक्षण न देकर मुसलमानों की तरह ही इनका ऐसा विकास किया जाए कि इन्हें आरक्षण की जरूरत ही न पड़े।
 
महाराष्ट्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने मराठा और मुसलमान दोनों के लिए आरक्षण की घोषणा की थी, जिस पर मुम्बई हाइ कोर्ट ने स्थगन आदेश दे दिया। वहां नई बनी BJP सरकार इस स्थगन आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई, लेकिन सिर्फ मराठा आरक्षण के लिए। इस तरह के न्यायिक और साहसी कदम की BJP से ही उम्मीद की जा सकती है।
 
केन्द्र में BJP की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। अच्छा मौका है कि नजमा हेपतुल्ला की सोच को विस्तृत तौर पर लागू किया जाए और सारे आरक्षण खत्म कर दिए जाएं। इससे सभी लोगों को समान अवसर भी उपलब्ध होगा। फिर मुसलमानों दवारा आरक्षण की मांग भी खत्म हो जाएगी। सवर्ण लोगों द्वारा आरक्षण की आलोचना भी बंद हो जाएगी। वोट बैंक की राजनीति भी खत्म होगी।
 
न्याय करने का दूसरा तरीका है 100% आरक्षण लागू करने का। जातीय जनगणना के अनुसार सवर्ण सहित सभी देशवासियों को आरक्षण की सुविधा दी जाए। इससे भी सभी लोगों को समान अवसर प्राप्त होगा और साथ ही वोट बैंक की राजनीति भी खत्म होगी। जहाँ तक मेधा का सवाल है तो मेधा किसी जाति की बपौती तो नही। हर धर्म और हर जाति मे मेधावी लोग हैं।
 

Saturday, December 27, 2014

RJD और JDU में गठबंधन हो तो बेहतर (Alliance is better than merger of RJD and JDU)

पिछले कुछ महीनों से बिहार की राजनीति मे राष्‍ट्रीय जनता दल और जनता दल युनाइटेड पार्टी के विलय की चर्चा जोरों पर है। यह संभावित विलय कब होगा, होगा भी या नहीं होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि दोनो पार्टियों के नेता इस मुद्दे पर बात करने से कतराते दिख रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो एक बार इससे साफ इनकार कर चुके हैं। लेकिन इन दोनों पार्टियों के अन्य नेताओं के मार्फत मीडिया मे जो थोड़ी बहुत खबर आ रही है, उससे लगता है कि अंदर ही अंदर इसकी तैयारी चल रही है। जब तैयारी मुकम्मल हो जाएगी तो पूरी खबर भी बाहर आ जाएगी।
jdu party-symbol.gif 2000px-rjd_flag_svg.png
 
अगर यह विलय हुआ भी तो इसके टिकाऊ होने की संभावना बहुत कम है। इसका मुख्य कारण यह है कि दोनों पार्टियों के सुप्रीमो बिहार के मुख्यमंत्री के रूप मे कई वर्षों तक सत्ता सुख भोग चुके हैं और दोनों की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा दिन साथ रहने पर टकराएंगी। मुख्य टकराव चुनाव के वक्त टिकट वितरण में होगा। आरजेडी के सुप्रीमो लालू यादव की कोशिश होगी कि उनके करीबी को ज्यादा टिकट मिले। फिर यही कोशिश जेडीयू के सुप्रिमो नीतीश कुमार की भी होगी। पार्टी पर पकड़ और वर्चस्व बनाए रखने के लिए भी दोनों नेताओं मे होड़ होगी और साथ ही सत्ता मिलने पर सत्ता मे हिस्सेदारी के लिए भी दोनों नेता लड़ सकते हैं।
 
दोनों पार्टियों के हित में यही है कि दोनों अलग-अलग रहकर ईमानदरीपूर्वक गठबंधन कर चुनाव लड़े। सीटों का आपसी सहमति से न्यायपूर्वक बंटवारा करें और चुनाव में एक-दूसरे को ईमानदारी से सहयोग करें। विलय की अपेक्षा दोनों पार्टियों का गठबंधन ज्यादा टिकाऊ होने की उम्मीद है क्योंकि इसमे आपसी टकराव की संभावना बहुत कम रहेगी और पार्टी के अंदर रहकर पार्टी को कमजोर करने वाले तत्व भी कमजोर रहेंगे। गठबंधन की स्थिति मे दोनों नेताओं का अपनी पार्टी पर पूर्ण नियंत्रण भी कायम रहेगा जिससे पार्टी को मजबूत रखने मे मदद मिलेगी।

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